‘अग्निपरीक्षा’ से उबल पड़े हैं शिक्षक, लेफ्ट पार्टी टीचर्स के साथ, गुस्सा संभाल पाएंगे नीतीश-तेजस्वी?

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पटना

बिहार में शिक्षकों की भर्ती की नई नियमावली ने बैठे-बिठाए रोजी-रोजगार का माहौल बना रही नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव की सरकार के खिलाफ राज्य भर में शिक्षकों को खड़ा कर दिया है। वोटर लिस्ट बनाने से लेकर बूथ पर चुनाव कराने के काम में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले करीब 3.50 लाख शिक्षकों को लोकसभा चुनाव से ठीक एक साल पहले नाराज करके महागठबंधन सरकार ने बड़ा रिस्क लिया है। एक तरफ शिक्षक उबल रहे हैं तो दूसरी तरफ सरकार को समर्थन दे रही लेफ्ट पार्टी सीपीआई-माले, सीपीआई और सीपीएम ने भी टीचर्स की मांग को जायज ठहरा दिया है।

बिहार में प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च माध्यमिक तीनों शिक्षकों के संगठन हाथ मिलाकर आंदोलन पर उतर आए हैं। 20 मई को सभी प्रमंडल मुख्यालय में प्रदर्शन से आंदोलन की शुरुआत होगी जिसके दूसरे चरण में 22 मई से जिला मुख्यालयों पर धरना का कार्यक्रम शुरू होगा। इसके बाद जुलाई में विधानसभा सत्र के दौरान पटना में प्रदर्शन होगा।

नई नियमावली को कैबिनेट की मंजूरी के बाद से लगातार शिक्षक संघ के नेता इसे शिक्षकों का अपमान बता रहे हैं लेकिन नीतीश सरकार पर कोई असर होता नहीं दिख रहा है। सरकार ने ऐलान कर दिया है कि शिक्षकों की नई भर्ती के लिए परीक्षा बीपीएससी लेगी जिसके जरिए करीब पौने दो लाख शिक्षक सरकारी कर्चमारी के दर्जा के साथ बहाल होंगे।

बिहार में नीतीश की नई शिक्षक भर्ती नियमावली का विरोध क्यों कर रहे हैं टीचर्स?

एक समय था जब बिहार के स्कूलों में विद्वान शिक्षक कायदे से पढ़ाने का काम कर रहे थे। ये वही दौर था जब बिहार के सरकारी स्कूलों से पढ़े-लिखे बच्चे आईएएस, आईपीएस, आईआईटी और एम्स की परीक्षाओं में थोक के भाव में पास हो रहे थे। फिर शिक्षकों का ट्रांसफर होने लगा। अध्ययन-अध्यापन और अनुशासन में शिक्षकों के इकबाल का भी एक रोल था जो स्थानांतरण के साथ खत्म हो गया। विद्वान शिक्षक रिटायर होते गए और उनकी जगह एडहॉक व्यवस्था ने ले ली।

जगन्नाथ मिश्रा सरकार ने 40 हजार शिक्षकों को बिना परीक्षा समायोजित किया था

जगन्नाथ मिश्रा जब बिहार के मुख्यमंत्री थे तब 1980 में उन्होंने राज्य भर के कई निजी ट्रस्ट या कमिटी द्वारा संचालित स्कूलों का सरकारीकरण कर दिया था। तब सरकार ने बगैर कोई परीक्षा लिए उन स्कूलों के 40 हजार शिक्षकों को बतौर सरकारी कर्मचारी समायोजित किया था। बिहार में मजबूत स्कूली शिक्षा के आखिरी दौर का सारा दारोमदार इन्हीं शिक्षकों के कंधे पर रहा। इनके कैडर को मरणशील घोषित कर दिया गया। फिर ये रिटायर होते गए और साथ में पढ़ाई का स्तर भी रिटायर होता गया। उनकी भरपाई में कभी शिक्षा मित्र तो कभी नियोजित शिक्षकों का सहारा लिया गया।

नीतीश कुमार सरकार ने शिक्षा मित्रों को बिना परीक्षा समायोजित किया था

लालू प्रसाद यादव ने अपने कार्यकाल में 1500 रुपए महीना पर शिक्षा मित्र रखने की शुरुआत की। 2006 में जब नीतीश कुमार की सरकार ने इन सबको समायोजित किया तो बिना कोई परीक्षा लिए सबको पंचायत शिक्षक के तौर पर नौकरी दी। 2006 से स्थानीय निकाय के जरिए शिक्षकों का नियोजन होने लगा। नई नियमावली से दिक्कत 2006 से स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों को है जो 17 साल सेवा देने के बाद भी सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं पा सके हैं।

अब दो-चार हजार रुपए ज्यादा वेतन और सरकारी सेवक का दर्जा पाने के लिए इनको बीपीएससी परीक्षा पास करने कहा जा रहा है। इनके पास एक विकल्प है कि वो जैसे हैं, वैसे ही बने रहना चाहते हैं तो परीक्षा ना दें। उनकी नौकरी पर कोई खतरा नहीं है लेकिन सरकार उनको सरकारी कर्मचारी का दर्जा नहीं देगी। उनकी पहचान नियोजन इकाई जैसे पंचायत, नगर निगम वगैरह से होगी।

17 साल की सेवा और वरीयता दोनों खत्म होने की चिंता

2006 से नियोजित शिक्षकों की आपत्ति है कि एक तो उनकी 17 साल की सेवा और वरीयता इस तरह की भर्ती के बाद होने वाली नई बहाली से खत्म हो जाएगी। दूसरी जब उनके पास शिक्षक बनने की सारी योग्यता पहले से है और तभी उनको 2006 में नियोजित किया गया तो फिर उन्हें दोबारा परीक्षा क्यों देनी होगी। ये सवाल कर रहे हैं कि 17 साल से बिहार के स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई का काम देख रहे शिक्षकों की योग्यता पर सरकार को भरोसा क्यों नहीं है? उन्हें क्यों बेरोजगार लोगों के साथ रोजगार की रेस में दौड़ाया जा रहा है। ये कह रहे हैं कि हम ये परीक्षा नहीं देंगे और सरकारी कर्मचारी का दर्जा लेने के लिए आंदोलन करेंगे।

बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के महासचिव और पूर्व सांसद शत्रुघ्न प्रसाद सिंह ने कहा है कि दो दशक से स्कूलों में पढ़ा-लिखा रहे शिक्षकों को सरकारी कर्मचारी का दर्जा और कुछ ज्यादा वेतन का लोभ देकर बीपीएससी की परीक्षा पास करने के लिए कहना शिक्षा और शिक्षक दोनों का अपमान है। सिंह ने कहा कि इससे एक स्कूल में एक ही तरह के काम करने वाले तीन तरह के शिक्षक हो जाएंगे जो संविधान से मिले समता के अधिकार का हनन है। उन्होंने कहा कि सरकार सम्मान के साथ शिक्षकों को काम करने नहीं देगी तो शिक्षक समान काम के लिए समान वेतन और समान दर्जा की मांग के लिए सड़क पर संघर्ष करेंगे।

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