October 4, 2022

डेढ़ करोड़ से अधिक बच्चों को किताब के लिए करना होगा इंतजार, राशि पहुंचाने के साथ किताबों की उपलब्धता बड़ी चुनौती

पटना

सरकारी स्कूलों में नया शैक्षिक सत्र 2022-23 पहली अप्रैल से आरंभ हो चुका है। सरकारी प्रारंभिक विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे एक अप्रैल से ही अपनी-अपनी नयी कक्षाओं में अध्ययन करने आ रहे हैं, लेकिन न तो अबतक उन्हें किताब खरीदने के पैसे सरकार की ओर से दिए गए हैं और न ही जिलों में किताबें ही पहुंची हैं।

आलम यह है कि नये सत्र के पहले महीने का आधा समय बीत जाने के बावजूद फिलहाल किताब को लेकर शिक्षा महकमा में राज्य मुख्यालय से लेकर जिला तक कोई सुगबुगाहट नहीं आरंभ हुई है। ऐसे में इन डेढ़ करोड़ से अधिक बच्चों को नयी कक्षा की पाठ्यपुस्तक के लिए अभी और इंतजार करना होगा।

चार दिन पूर्व पीएबी की बैठक में केन्द्र सरकार ने बच्चों की किताब के लिए 520 करोड़ की स्वीकृति दे दी है लेकिन अभी यह राशि बच्चों तक पहुंचने में कई प्रक्रिया से गुजरेगी।

गौरतलब है कि मुफ्त एवं अनिवार्य शिक्षा अधिकार कानून (आरटीई) के तहत प्रारंभिक स्कूलों के बच्चों को निशुल्क किताबें मुहैया करानी है। केन्द्र प्रायोजित समग्र शिक्षा के तहत इसके लिए राशि का प्रावधान किया जाता है। परंतु बिहार में 2018 से किताब क्रय के पैसे बच्चों को खाते में दिए जा रहे हैं और टेक्सटबुक द्वारा अधिकृत प्रकाशकों द्वारा उपलब्ध कराई गई किताबें खुले बाजार से उन्हें खरीदनी है परंतु खाते में पैसा आने के बाद उस राशि का बच्चों का परिवार दूसरी जरूरत में उपयोग कर ले रहा है।

पिछले चार साल की रिपोर्ट यही कहानी कह रही है। राज्य में किताब के बदले पैसे की व्यवस्था इसलिए हुई क्योंकि किताब अप्रैल से आरंभ होने वाले सत्र में बच्चों को सितम्बर से नवम्बर माह तक मिल पाती थीं परंतु पैसे भेजने का आलम भी वैसा ही है। पिछले सत्र का पैसा बच्चों के खाते में अगस्त माह के आखिर में भेजा गया था।

अपर मुख्य सचिव संजय कुमार ने कहा, ‘नया सत्र आरंभ हो गया है। पैसे की कोई समस्या नहीं है। इसी माह प्रारंभिक स्कूलों में नामांकित सभी बच्चों को किताब के पैसे मिल जाएंगे।

राशि पहुंचाने के साथ किताबों की उपलब्धता बड़ी चुनौती
शिक्षा विभाग के लिए प्रारंभिक स्कूलों में नामांकित करीब डेढ़ करोड़ बच्चों को किताब क्रय की राशि देने के बाद बच्चों के पास किताब की उपलब्धता सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती साबित होने वाली है। निचले स्तर तक यह व्यवस्था बनानी होगी कि हर कक्षा की सभी किताबें खरीद के लिए उपलब्ध हों और बच्चे किताब खरीदें।

अभिभावक अपने बच्चों के खाते में आई राशि का कहीं और उपयोग न कर लें। पिछले तीन-चार साल के आंकड़े तो यही बता रहे हैं। किताब के बदले पैसे की व्यवस्था लागू होने के बाद पहले साल 13 फीसदी, दूसरे साल 19 तो तीसरे साल 11 फीसदी किताबें ही खरीद हुईं।

यह हाल तब है जब 2018-19 में 26,429.071 लाख, 2019-20 में 50,036.901 लाख, 2020-21 में 37,864.801 लाख रुपए बच्चों के खाते में भेजे गए। इस दौरान मुद्रकों की क्रमश: 7013.1 लाख, 9420.90 और 5269.15 लाख रुपए की ही किताबें इन तीन वर्षों में बिकीं। 2021-22 में 402 करोड़ 71 लाख 15200 रुपए बच्चों को डीबीटी किए गए।

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