September 30, 2022

साहित्य सम्मेलन में डा शंकर प्रसाद की पुस्तक का हुआ लोकार्पण।

यादों के दरीचे’ से कला, संगीत और साहित्य के कई आयाम खुलते हैं 

पटना,

कला, संगीत और साहित्य में महनीय अवदान देने वाले हिन्दी के प्राध्यापक डा शंकर प्रसाद की पुस्तक ‘यादों के दरीचे’, संस्मरण साहित्य में विशेष योगदान के लिए स्मरण किया जाएगा। यह पुस्तक कला, संगीत और साहित्य से जुड़ी अनेक महान विभूतियों से पाठकों को जोड़ती है तथा उन्हें समझने की एक नई दृष्टि भी देती है। इसमें सारस्वत क्षेत्रों के साथ मायानगरी के भी अनेक आयाम खुलते दिखाई देते हैं।
यह बातें शनिवार को, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में, डा प्रसाद की पुस्तक के लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता करते हुए, सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने कही। उन्होंने कहा कि डा शंकर का संपूर्ण जीवन विवधताओं से भरा रहा है। ६ वर्ष की अल्पायु में सिर से पिता के छत्र से वंचित हो चुका, साधारण किसान परिवार का एक बालक, लोक-गायन की ओर प्रवृत होता है और आकाशवाणी के उद्घोषक से लेकर हिन्दी के प्राध्यापक तक, और उसके पश्चात बिहार संगीत नाटक आकादमी के अध्यक्ष पद और फ़िल्म समीक्षक तक की सारस्वत यात्रा के विविध योग-संयोग संजोता हुआ अनुभव और अनुभूतियों का भंडार समृद्ध करता है, तो उसके संस्मरण भी क्या कम रोचक होंगे! और जब कोई लेखक इस बड़ी पूँजी के साथ लेखनी उठाता हो तो उसके संस्मरण साहित्य में विविधताएँ और रहस्य-रोमांच तो होंगे ही। यही कारण है कि लोकार्पित पुस्तक अपनी सामग्रियों के कारण रोचकताओं से परिपूर्ण और पठनीय है।


समारोह का उद्घाटन करते हुए, पूर्व केंद्रीय मंत्री और सुप्रसिद्ध चिकित्सक डा सी पी ठाकुर ने कहा कि पुस्तक लिखने का कार्य बड़ा कठिन है। इसीलिए लेखक और कवियों का समाज में ऊँचा स्थान है। पुस्तकें समाज पर गहरा प्रभाव डालती हैं। डा शंकर प्रसाद एक गुणी कलाकार और बड़े साहित्यकार हैं। उनके संस्मरण से पाठकों का बड़ा लाभ होगा।
मुख्य अतिथि और पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजेंद्र प्रसाद ने कहा कि कोई भी सामान्य व्यक्ति भविष्य में प्रवेश नहीं कर सकता, किंतु हर व्यक्ति भूतकाल में यात्रा कर सकता है। भूतकाल से जब हम प्रेरक अंश चुन पाते हैं, तो उससे पीढ़ियाँ प्रेरणा प्राप्त करती हैं। किसी व्यक्ति को जानना हो तो उसके कृतित्व और कृति को जानना चाहिए। डा शंकर के बहुआयामी व्यक्तित्व को जानने के लिए उनकी पुस्तक ‘यादों के दरीचे’ को पढ़ा जाना चाहिए।
पटना उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति हेमन्त कुमार श्रीवास्तव, विश्वविद्यालय सेवा आयोग के अध्यक्ष डा राजवर्द्धन आज़ाद, दूरदर्शन बिहार के कार्यक्रम प्रमुख डा राज कुमार नाहर, वरिष्ठ कवि राम उपदेश सिंह ‘विदेह’, सम्मेलन की उपाध्यक्ष डा मधु वर्मा, ओम् प्रकाश पाण्डेय ‘प्रकाश’, कुमार अनुपम, डा अनिल कुमार यादव, डा ध्रुव कुमार, वरिष्ठ कवयित्री आराधना प्रसाद, डा अशोक प्रियदर्शी, डा अर्चना त्रिपाठी, डा पुष्पा जमुआर, पंकज कुमार वसंत, सागरिका राय, कवि बच्चा ठाकुर, डा विनय कुमार विष्णुपुरी, डा सीमा यादव, डा सुषमा कुमारी, ब्रह्मानन्द पाण्डेय, जय प्रकाश पुजारी, डा सत्येंद्र सुमन, बाँके बिहारी साव, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, डा दिनेश दिवाकर तथा डा उमा शंकर सिंह ने भी अपने उद्गार व्यक्त किए तथा पुस्तक के लेखक को अपनी शुभकामनाएँ दीं। मंच का संचालन कवि सुनील कुमार दूबे ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
समारोह में, डा विजय कुमार दिवाकर, कवि भागवत शरण झा ‘अनिमेष’, दीपक ठाकुर, चंदा मिश्र, प्रनय कुमार सिन्हा, डा कुंदन लोहानी, डा श्याम मोहन, प्रवीर कुमार पंकज, प्रभात कुमार धवन, अनिल रश्मि, राजेश कुमार शुक्ल, अरुण कुमार श्रीवास्तव, अंकेश कुमार श्री बाबू आदि बड़ी संख्या में सुधीजन और साहित्यकार उपस्थित थे।

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