September 25, 2022

बीजेपी ने जातीय जनगणना पर खत्म किया सस्पेंस, सर्वदलीय बैठक में होगी शामिल; जदयू और हम के आरोपों पर दिया यह जवाब

पटना

जातिगत जनगणना को लेकर बीजेपी सत्तारूढ़ गठबंधन सहयोगियों के साथ-साथ विपक्ष की आलोचना का भी सामना कर रही है। ऐसे में अब पार्टी का कहना है कि वह बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में एक जून को होने वाली सर्वदलीय बैठक में हिस्सा लेगी। इस बैठक में राज्य स्तरीय जातीय जनगणना करवाने के तौर-तरीकों पर चर्चा की जाएगी।

जातीय जनगणना कराने के मुद्दे पर एनडीए के बीच दरार देखी गई है। एनडीए की सहयोगी पार्टियां जदयू और हम ने पार्टी पर इस कदम को रोकने का आरोप लगाया है। इस स्थिति में भाजपा के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद को मजबूरन बयान जारी करना पड़ा कि पार्टी के बारे में यह झूठा प्रचार किया जा रहा है कि बीजेपी जातीय जनगणना के खिलाफ है। बीजेपी के इस बैठक में शामिल होने या ना होने लेकर सस्पेंस बना हुआ था।

हालांकि, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ संजय जायसवाल ने बुधवार शाम को पुष्टि की कि भाजपा बैठक का हिस्सा बनेगी। संजय जायसवाल ने ट्वीट कर कहा, ‘मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 1 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई है। इसमें भारतीय जनता पार्टी भी हिस्सा लेगी।’ पिछले दो हफ्ते से राज्य में जातीगत जनगणना कराने के मुद्दे पर राजनीतिक बवाल खड़ा हो गया है।

10 मई को, विधानसभा में विपक्ष के नेता और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने जातीगत जनगणना नहीं होने पर पटना से दिल्ली तक पैदल मार्च निकालने की धमकी दी थी। इसके बाद तेजस्वी और नीतीश कुमार ने 11 मई को इस मुद्दे पर बंद कमरे में बैठक की, जिसके बाद घोषणा की गई कि जातीगत जनगणना से संबंधित सभी मापदंडों पर चर्चा के लिए एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी।

इस मुद्दे ने सत्तारूढ़ एनडीए के अंदर एक दरार पैदा करने का काम किया है। नीतीश कुमार की जदयू और जीतन राम मांझी की पार्टी हम के नेताओं ने सहयोगी दल बीजेपी पर ‘इस कदम को रोकने’ का आरोप लगाया है। पिछले हफ्ते, मांझी ने जातीय जनगणना पर ‘अपना पत्ते नहीं खोलने’ के लिए बीजेपी को दोषी ठहराया था, जबकि जदयू के वरिष्ठ नेता उपेंद्र कुशवाहा ने भी देरी के लिए भाजपा को जिम्मेदार ठहराया था।

राजद और जदयू सालों से जातीय जनगणना की मांग कर रहे हैं। समाजवादी पार्टी के साथ दोनों दलों ने कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) को 2010 में राष्ट्रीय स्तर पर जातीय जनगणना की मांग पर सहमत होने के लिए मजबूर किया था। ये बात और है कि पिछले दशक की गणना के दौरान इकट्ठा किया गया डाटा को कभी भी सामने नहीं आया।

जातीय आंकड़ों को सार्वजनिक करने की मांग करते हुए सालों बिताने के बाद, राजद और जदयू के नेता हाल ही में इस बात पर सहमत हुए हैं कि उन्हें राज्य स्तर पर इसके लिए प्रयास करना चाहिए। इन दलों ने तर्क दिया है कि 1931 में अंतिम बार की गई जातियों की गिनती इस बात का सही आकलन देती हैं कि कैसे जातियां संख्यात्मक रूप से तैयार हैं और कोटा से किन समूहों को सबसे अधिक और सबसे कम लाभ हुआ है।

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